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Saturday 22 November, 2008
 18:42 | 31/Jul/2008 |  2 Comment(s)
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JARA SOCHIYE

महान ब्रिटिश नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ को एक दिन उनकी किसी परिचित महिला ने पार्टी में बुलाया। शॉ ने अपनी व्यस्तता के चलते पहले तो काफी आनाकानी की, लेकिन महिला की जिद पर आखिर उन्होंने हामी भर दी। काम की व्यस्तता के बीच वे पार्टी के बारे में भूल गए।

अचानक उन्हें ध्यान आया कि पार्टी का समय हो चुका है, तो वे सीधे उठकर उस महिला के घर पहुँच गए। उन्हें देखकर महिला का चेहरा खिल गया, लेकिन जैसे ही उसकी नजर उनके कपड़ों पर पड़ी, वह खिन्न होकर बोली- आप ये कैसे कपड़े पहनकर आ गए। शॉ बोले- मुझे कपड़े बदलने का समय ही नहीं मिला, इसलिए ऐसे ही चला आया।

क्या फर्क पड़ता है। महिला बोली- नहीं-नहीं, मैंने पार्टी में एक से बढ़कर एक लोग बुलाए हैं। ऐसे में ये कपड़े नहीं चलेंगे। प्लीज, आप घर जाकर जल्दी से कपड़े बदल आइए। ये मेरी इज्जत का सवाल है। शॉ को महिला की यह जिद भी मानना पड़ी और वे घर से अच्छी तरह सूटेड-बूटेड होकर आ गए। इसके बाद पार्टी में जब खाने का समय आया तो वे खाना खुद खाने की बजाय कपड़ों पर पोतने लगे। हैरान लोगों ने जब उनसे इसका कारण पूछा तो वे बोले- आज का खाना मुझे इन्हीं कपड़ों की वजह से नसीब हुआ है, इसलिए इन्हें खिला रहा हूँ। यह सुनकर उस महिला का सिर शर्म से झुक गया।

दोस्तो, अब ऐसे व्यक्ति के यहाँ क्या जाना, जिसके लिए आप नहीं, आपका पहनावा ज्यादा महत्वपूर्ण है, लेकिन विडंबना यह है कि व्यक्ति की हैसियत का आकलन इसी ऊपरी दिखावे से किया जाता है। कथित हाई सोसाइटी की पार्टियों में तो यह रोजमर्रा का काम है, जिनमें कि लटक-झटक के आधार पर ही व्यक्ति की पूछ-परख होती है।
लोगों की नजरें इसी बात पर लगी रहती हैं कि कौन कितनी महँगी गाड़ी में कैसी ज्वेलरी पहनकर आया है। उसने किस-किस ब्राण्ड के कपड़े-जूते पहने हैं, कौन-सा परफ्यूम लगाया है, घड़ी-मोबाइल किस कंपनी के हैं। यह सोच गलत है। पहनावे की कीमत व्यक्ति से होती है, पहनावे से व्यक्ति की नहीं।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ चिथड़े पहनने से भिखारी नहीं बन जाते और न ही शाही कपड़े पहनकर वे जॉर्ज पंचम हो सकते थे। वे तो जो थे, वही रहते। कपड़े भले ही कैसे भी हों, क्योंकि कपड़ों से व्यक्ति की सोच नहीं बदलती। हाँ, सोच से कपड़े जरूर बदल जाते हैं। यदि व्यक्ति की सोच गरीब है, तो वह ऊपरी दिखावे में उलझा रहता है और सोच समृद्ध है तो फिर दिखावे से उसका नाता नहीं होता। तभी तो जो अंदर से खोखले होते हैं, वे अपनी कमियों को आवरण में छिपाने की कोशिश करते हैं।

इसलिए कभी इस बात पर ध्यान न दें कि सामने वाले ने क्या ओढ़ा-पहना है, बल्कि यह देखें कि वह इंसान कैसा है और यदि कोई अंदर से गलत लगे यानी उसका आचरण ठीक न लगे, तो उसे कहिए कि वह अपने अंदर का पहनावा बदले। साथ ही यदि किसी के चेहरे पर उदासी, मुर्दानगी, निराशा, तनाव, घृणा, कटुता, अहं, क्रोध का आवरण देखें तो उसे आवरण बदलने की सीख दें, ताकि उसे देखकर लोग यह न कहें कि आप कैसे-कैसे लोगों के साथ उठते-बैठते हैं। ऐसे लोगों का आवरण बदलवाने वालों की दुनिया इज्जत करती है। वर्ना जो उस महिला की तरह सिर्फ ऊपरी दिखावे में रह जाते हैं, उन्हें अंततः खुद ही नजरें झुकाना पड़ती हैं।

और अंत में, उन्होंने बताया कि व्यक्ति की पहचान उसके व्यक्तित्व, उसकी योग्यता, प्रतिभा से की जाना चाहिए। इसका मतलब यह भी नहीं है कि आप जो मन में आए पहन लें। टिपटॉप बनकर रहना कोई गलत बात नहीं, यदि आप पहनावे के साथ ही व्यावहारिक रूप से भी टिपटॉप बनकर रहें। यह नहीं कि आपका पहनावा तो बड़ा खूबसूरत है, लेकिन आपके चेहरे पर उसके अनुरूप मुस्कराहट नहीं।

तब आपके महँगे कपड़े भी किसी काम के नहीं रहेंगे, क्योंकि ऐसे में लोग आपसे कन्नी ही काटेंगे। कुल मिलाकर सारा मामला व्यवहार का है। व्यवहार अच्छा होगा तो आप कहीं भी जाएँ, लोग आपको घेर लेंगे। इसके विपरीत होने पर मुँह फेर लेंगे। अरे भई, तुमने अपनी आदतें नहीं सुधारीं तो किसी दिन भरी महफिल में नंगे हो जाओगे।
 

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